Saturday, 31 March 2018

यौन दुर्बलता: कहीं आपकी कुंडली में भी ऐसा दोष तो नहीं

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

सुखद वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, तालमेल, सामंजस्य होता है, लेकिन वैवाहिक जीवन में यौन सुख भी उतना ही आवश्यक है। क्योंकि यौन सुख का संबंध उत्तम संतान प्राप्ति से है। कई जोडि़यां सिर्फ इसलिए टूट जाती हैं क्योंकि स्त्री या पुरुष में से किसी एक को यौन दुर्बलता होती है। वे वैवाहिक जीवन का आनंद नहीं उठा पाते। ज्योतिष में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। ऐसे अनेक योग-दोष बताए गए हैं, जो कुंडली में उपस्थित हों तो व्यक्ति यौन सुख से वंचित रह जाता है। ज्योतिष की यह बात बहुत अच्छी है कि यह सिर्फ योग, दोष की जानकारी ही नहीं देता बल्कि उन परेशानियों से बचने के उपाय भी बताता है।


आइये सबसे पहले जानते हैं यौन सुख, संतृप्ति कौन-कौन से ग्रह, राशि और लग्न से प्रभावित होती है: 

  • चंद्र : चंद्र का प्रभाव मन-मस्तिष्क और शरीर में प्रवाहित होने वाले तरल पदार्थों पर होता है। यह स्त्रियों के प्रजनन अंगों, गर्भावस्था, मेनोपॉज और फर्टिलिटी को प्रभावित करता है।
  • शुक्र : प्रजनन अंगों, यौन सुख, यौन की इच्छा, यौन गतिविधियों को प्रभावित करता है।
  • सूर्य और मंगल : शरीर के मेटाबॉलिज्म, आंतरिक उर्जा पर असर।
  • तुला राशि : यौन संबंधों की इच्छा, जननांग, जीवनसाथी का स्वास्थ्य।
  • लग्न : शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की जानकारी।

ऐसी ग्रह स्थिति ठीक नहीं

जातक के जीवन में यौन सुखों की जानकारी चंद्र, शुक्र, मंगल, सूर्य और तुला राशि के अनुसार ज्ञात की जाती है। इन ग्रहों की स्थितियों और युति के अनुसार यौन संबंधों के बारे में पता लगाया जाता है। ज्योतिष में ऐसे अनेक योग बताए गए हैं जो सेक्सुअल लाइफ को प्रभावित करते हैं।


  • जन्मांग चक्र में यदि मंगल तुला राशि में बैठा हो तो इससे यौन अंग कमजोर रहते हैं। स्त्री-पुरुष को पूर्ण यौन सुख नहीं मिलता।
  • तुला राशि में मंगल या सूर्य के साथ राहु हो तो व्यक्ति यौन रोगों से परेशान रहता है।
  • तुला राशि में एक साथ चार ग्रह आ जाएं तो स्त्री हो या पुरुष वह नपुंसक होता है।
  • कमजोर या नीच का शुक्र यदि स्त्री की कुंडली में सातवें भाव में हो तो वह बांझ होती है, पुरुष की कुंडली में ऐसा योग उसे नपुंसक बनाता है।
  • वक्री या कमजोर मंगल सातवें भाव में हो तो व्यक्ति मूत्राशय के रोगों से पीडि़त होता है।
  • शनि और शुक्र आठवें या 10वें भाव में हो और इनके साथ कोई शुभ ग्रह न हो तो नपुंसकता आती है।
  • छठे या 12वें भाव में कमजोर, शक्तिहीन शनि सेक्स लाइफ खराब कर देता है।
  • शुक्र से शनि छठा या 12वां हो तो स्त्री यौन सुख से वंचित रहती है।
  • तुला राशि के चंद्र पर मंगल, राहु और शनि की दृष्टि हो तो स्त्री या पुरुष अपने पार्टनर को संतुष्ट नहीं कर पाते।
  • लग्नेश स्वग्रही हो और इस पर सातवें शुक्र की दृष्टि हो तो यौन दुर्बलता के कारण संतान सुख नहीं मिलता।
  • शनि छठे या 12वें भाव में जल राशि में हो तो यौन रोग होते हैं। इनके अलावा भी कई योग-दोष हैं जो नपुंसकता का कारण बनते हैं।

यह है निवारण

यदि कुंडली में ऐसे ग्रह दोष हों तो व्यक्ति को शुक्र और मंगल को मजबूत करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए मूंगा के साथ सफेद जिरकन धारण किया जाता है। शुक्र के बीज मंत्र ।। ओम द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ।। और मंगल के बीज मंत्र ।। ओम क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः ।। का नियमित जाप यौन दुर्बलता दूर करता है।

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जीवन को प्यार से भर देता है रोज क्वार्ट्ज

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

प्रेम जीवन का सबसे खूबसूरत एहसास होता है। प्रेम के बिना सब सूना सा लगता है। प्यार की भावना सभी के मन में होती है और प्यार पाने के लिए लोग किसी भी हद तक गुजर जाते हैं। इसके बावजूद वे अपने दिल में बसे युवक-युवती या स्त्री-पुरुष को हासिल नहीं कर पाते और किसी का प्यार हासिल नहीं कर पाने की कुंठा उनके मन-मस्तिष्क पर इतना बुरा प्रभाव डालती है कि उनका जीवन पूरी तरह बर्बाद सा हो जाता है।


यदि आप भी अपने जीवन में परफेक्ट पार्टनर की तलाश कर रहे हैं, या किसी का प्यार पाना चाह रहे हैं, किसी को मन ही मन चाहते तो हैं लेकिन उसका ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पा रहे हैं तो इसका समाधान क्रिस्टल में तलाशा जा सकता है। अनेक बहुमूल्य रत्न और क्रिस्टल ऐसे होते हैं जो प्रेम के प्रतिनिधि होते हैं। उनके संपर्क में आने से व्यक्ति के आकर्षण प्रभाव में वृद्धि होती है और वह मनचाहे साथी के दिल में जगह बना लेने में सक्षम होता है।

मनुष्य के मन में प्रेम की भावना विकसित करने में चमत्कारिक रूप से काम करता है रोज क्वार्ट्ज। हिंदी में इसे गुलाबी स्फटिक कहा जाता है। यह पिंक के कई तरह के शेड्स में आता है। इसे लव स्टोन के नाम से भी जाना जाता है। रोज क्वार्ट्ज से निकलने वाली तरंगें सीधे मन और भावनाओं को प्रभावित करती हैं। इसकी सकारात्मक उर्जा से इसके संपर्क में आने वाला व्यक्ति प्रभावित होता है और उसके मन में अच्छी-अच्छी भावनाओं का विकास होता है। कुंडलिनी विज्ञान में हार्ट चक्र यानी अनाहत चक्र को जाग्रत करने के लिए रोज क्वार्ट्ज का इस्तेमाल किया जाता है। यह क्वार्ट्ज जिस व्यक्ति के पास होता है उसके आसपास रहने वाले लोग भी इससे उर्जा क्षेत्र में आकर सम्मोहित हो जाते हैं और धारण करने वाले के प्रति भावनात्मक लगाव महसूस करते हैं। 

रोज क्वार्ट्ज के क्या हैं लाभ

1. हृदय चक्र को जाग्रत करके सकारात्मक उर्जा का संचार करता है।
2. आकर्षण शक्ति बढ़ाता है। इसे धारण करने वाले के आसपास रहने वाले आकर्षित होते हैं।
3. दांपत्य जीवन में खुशहाली लाता है। पति-पत्नी के संबंधों में प्रेम का संचार होता है।
4. प्रेमी-प्रेमिकाएं यदि दोनों रोज क्वार्ट्ज धारण करें तो उसका प्रेम संबंध मजबूत होता है।
5. घर में रोज क्वार्ट्ज की बॉल रखने से परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहता है।
6. भावनात्मक रूप से कमजोर और डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति इसे जरूर पहनें।

कैसे पहनें

1. रोज क्वार्ट्ज का पेंडेंट पहना जाता है, लेकिन इसका आकार बड़ा होना चाहिए।
2. रोज क्वार्ट्ज की माला पहनना सबसे ज्यादा लाभ देता है। इसके मोतियों की बनी माला धारण करना चाहिए।
3. घर में रखने के लिए रोज क्वार्ट्ज से बने गणेशजी, लाफिंग बुद्धा और अन्य सजावटी वस्तुएं भी आती हैं, जिन्हें ड्राइंग रूम में रखा जा सकता है।
4. यदि आप किसी को रोज क्वार्ट्ज उपहार में देते हैं तो वह हमेशा आपके आकर्षण प्रभाव में रहेगा।
5. रोज क्वार्ट्ज का ब्रेसलेट हाथ में पहना जा सकता है।

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इन चीजों से करेंगे हवन, तो पाएंगे समृद्धि

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य


हिंदू सनातन परंपरा में यज्ञ या हवन का बड़ा महत्व बताया गया है। हवन की अग्नि शुद्धिकरण का सबसे बड़ा माध्यम है। कुंड में अग्नि के माध्यम से देवी-देवताओं को हविष्य पहुंचाने की प्रक्रिया को हवन कहते हैं। हविष्य वह पदार्थ है जिनसे हवन की पवित्र अग्नि में आहुति दी जाती है। पुरातन काल से ही किसी कामना की पूर्ति के लिए यज्ञ करने की परंपरा रही है। ऋषि-मुनि दिव्य दृष्टि प्राप्त करने, देवताओं को प्रसन्न करने, वर्षा कराने, राक्षसों का नाश करने जैसे अनेक कार्यों के लिए यज्ञ करते आए हैं। राजा-महाराजा अपने राज्य की खुशहाली, विस्तार और शत्रुओं से रक्षा के लिए यज्ञ करते थे।


जिस तरह वेदों में यज्ञ या हवन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है, उसी तरह ज्योतिष शास्त्र में भी हवन का उतना ही महत्व है। नवग्रहों की शांति के लिए तथा प्रत्येक ग्रह के मंत्र जप के बाद जप संख्या का दशांश हवन करने का विधान है। दरअसल हवन के बिना कोई भी पूजा, मंत्र जप पूर्ण नहीं हो सकता। विभिन्न ग्रंथों में यज्ञ पद्धति के संबंध में बताया गया है कि अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए हवन में अलग-अलग सामग्रियों की आहुति दी जाती है। यदि सुख-समृद्धि की कामना के लिए हवन किया जा रहा है तो उसमें कोई विशिष्ट वस्तु की आहुति दी जाती है। आरोग्यता के लिए अलग सामग्री का प्रयोग किया जाता है तथा नवग्रहों की शांति के निमित्त किए जा रहे हवन में अलग तरह की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कामना के अनुसार हवन की पवित्र अग्नि में फल, शहद, घी, काष्ठ, जौ, तिल आदि की आहुति दी जाती है।

कामना के अनुसार समिधा

समिधा उस लकड़ी को कहते हैं जो हवन या यज्ञ में प्रयुक्त की जाती है। यदि नवग्रहों की शांति के लिए हवन किया जा रहा है तो प्रत्येक ग्रह के अनुसार अलग-अलग समिधा का उपयोग किया जाता है। सूर्य के लिए मदार, चंद्र के लिए पलाश, मंगल के लिए खेर, बुध के लिए चिड़चिड़ा, गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी, राहु के लिए दूर्वा और केतु के लिए कुशा की समिधा हवन में प्रयुक्त की जाती है। मदान की समिधा रोगों का नाश करती है। पलाश की समिधा सभी कार्यों में उन्नति, लाभ देने वाली है। पीपल की समिधा संतान, वंश वृद्धि, गूलर की स्वर्ण प्रदान करने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु प्रदान करती है और कुशा की समिधा सभी मनोरथ सिद्ध करने के लिए प्रयोग की जानी चाहिए। अन्य समस्त देवताओं के लिए आम, पलाश, अशोक, चंदन आदि वृक्ष की समिधा हवन में डाली जाती है।

ऋतुओं के अनुसार समिधा

यज्ञीय पद्धति में ऋतुओं के अनुसार समिधा उपयोग करने के लिए भी स्पष्ट नियम बताए गए हैं। जैसे वसंत ऋतु में शमी, ग्रीष्म में पीपल, वर्षा में ढाक या बिल्व, शरद में आम या पाकर, हेमंत में खेर, शिशिर में गूलर या बड़ की समिधा उपयोग में लाई जानी चाहिए।

पर्यावरण शुद्धि और उत्तम स्वास्थ्य के लिए हवन

अग्नि में मूलतः शुद्धिकरण का गुण होता है। वह अपनी उष्णता से समस्त बुराइयों, दोषों, रोगों का नाश करती है। अग्नि के संपर्क में जो भी आता है वह उसे शुद्ध कर देती है। इसीलिए सनातन काल से यज्ञ, हवन की परंपरा चली आ रही है। पाश्वात्य देशों के अनेक शोधकर्ता यह साबित कर चुके हैं कि जिस जगह नियति अग्निहोत्र या हवन होता है, वहां की वायु अन्य जगह की वायु की अपेक्षा अधिक स्वच्छ होती है। हवन में डाली जाने वाली वस्तुएं न सिर्फ पर्यावरण को शुद्ध रखती हैं, बल्कि रोगाणुओं को भी नष्ट कर देती है। इससे कई बीमारियां ठीक हो जाती हैं। हवन में डाले जाने वाले कपूर और सुगंधित दृव्य वातावरण में एक विशेष प्रकार का आरोमा फैला देते हैं जिसका मन-मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

कैसी हो हवन सामग्री

हवन में प्रयुक्त की जाने वाली सामग्री सड़ी-गली, घुन, कीड़े लगी हुई, भीगी हुई नहीं होना चाहिए। श्मशान में लगे वृक्षों की समिधा का प्रयोग हवन में नहीं करना चाहिए। पेड़ की जिस डाल पर परिंदों का घोसला हो उसे काटकर हवन में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। कोई दूसरी डाल काटकर उपयोग में लाएं। जंगल और नदी के किनारे लगे वृक्षों की समिधा हवन के लिए सर्वश्रेष्ठ कही गई है। 

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Friday, 30 March 2018

कमजोर सूर्य छीन सकता है आंखों की रोशनी

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

नेत्र प्राणियों का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। नेत्र के बिना जीवन अंधकारमय है, लेकिन अक्सर कई लोगों का पूरा जीवन आंखों की बीमारियों से जूझते हुए बीत जाता है। कई लोगों को तो बचपन से आंखों पर चश्मा लग जाता है। आखिर क्यों होता है ऐसा। 

जन्म कुंडली में द्वितीय स्थान को नेत्र स्थान भी कहा जाता है। आंखों से संबंधित रोगों के लिए द्वितीय भाव से विचार किया जाता है। साथ ही द्वादश भाव में स्थित ग्रहों से भी जातक के नेत्र रोगों के संबंध में जानकारी प्राप्त की जाती है। ज्योतिष के कुछ विद्वानों का मानना है कि द्वितीय भाव से दाहिनी आंख और द्वादश भाव से बायीं आंख के रोगों का विचार किया जाता है, लेकिन मुख्यतः दोनों आंखों के रोगों का विचार द्वितीय भाव से ही किया जाता है। इसलिए द्वितीय भाव में मौजूद राशि और ग्रहों के आधार पर नेत्र रोगों का पता लगाया जाता है।



आइये जानते हैं कुंडली में वे कौन-सी स्थिति हैं जिनसे आंखों की बीमारी होने की आशंका रहती है:
  1. ज्योतिष में सूर्य और चंद्र को नेत्र कहा गया है। सूर्य दाहिनी आंख और चंद्र बायीं आंख हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के दूसरे भाव में सूर्य हो और बारहवें भाव में चंद्र हो तो गंभीर नेत्र रोग होता है। यहां तक कि व्यक्ति की आंख की रोशनी जा सकती है।
  2. सूर्य पित्त ग्रह है। आयुर्वेद में नेत्र रोगों का कारण पित्त को माना गया है। भृगु संहिता के अनुसार जन्मांग चक्र में सूर्य प्रथम भाव में हो तो व्यक्ति नेत्र रोगी होता है। इस घर में सूर्य नीच का होना भी गंभीर नेत्र रोगों का कारण बनता है।
  3. सूर्य का दूसरे भाव में उपस्थित होना भी गंभीर नेत्र रोग को दर्शाता है। सूर्य के साथ यदि इस भाव में मंगल हो तो व्यक्ति पूरी तरह ब्लाइंड हो सकता है।
  4. कमजोर सूर्य यदि छठे या 12वें भाव में हो तो व्यक्ति पूरी उम्र नेत्र रोग से पीडि़त रहता है।
  5. अनेक विद्वान मंगल और शनि ग्रह को भी नेत्र रोगों का कारण मानते हैं। उनके अनुसार यदि द्वितीय भाव में मंगल और द्वादश भाव में शनि हो तो व्यक्ति को को आंखों के कारण सिरदर्द की समस्या बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति को चश्मा लगाना पड़ता है।
  6. त्रिक स्थान यानी छठे, आठवें और 12वें भाव में पाप और कमजोर ग्रहों की उपस्थित के कारण व्यक्ति को आंखों का ऑपरेशन करवाने की नौबत आती है।
  7. द्वितीय या द्वादश भाव में शनि-मंगल एक साथ आने पर व्यक्ति अंधा होता है। किसी चोट, दुर्घटना की वजह से उसकी आंखों की रोशनी छिन जाती है।
  8. द्वितीय या द्वादश भाव के स्वामी यदि मेष या सिंह राशि में हों तो व्यक्ति बचपन से नेत्र रोगों का शिकार बनता है।
  9. दूसरे या 12वें भाव में सूर्य के साथ केतु बैठा हो तो व्यक्ति के मोतियाबिंद का ऑपरेशन होता है।
  10. छठे, आठवें या 12वें भाव में चंद्र के साथ मंगल की उपस्थिति भी नेत्र रोगों का कारण बनती है।

नेत्र रोगों से बचने के उपाय

  1. नेत्र रोग मुख्यतः सूर्य के कारण होते हैं। नेत्र रोगों से बचाव के लिए सूर्य की उपासना अत्यंत आवश्यक है। प्रतिदिन सूर्य को जल चढ़ाएं। इस बात का ध्यान रखें कि सूर्य को जल प्रातः सूर्योंदय के समय अर्पित करें और जो जल की धारा आप छोड़ें उसके बीच से सूर्य को देखें। 
  2. सामाजिक कार्य करें, खासकर ब्लाइंड बच्चों को अपनी मनपसंद वस्तुएं दान करते रहें। आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करने से नेत्र रोगों में आराम मिलता है।
  3. सूर्य शांति पूजा करवाएं और सूर्य यंत्र धारण करें।
  4. चाक्षुषी स्तोत्र का नियमित पाठ करें।
  5. आंखों की ज्योति बढ़ाने में सूर्य का रत्न माणिक्य बहुत काम का है, लेकिन इसे धारण करने से पहले किसी ज्योतिषी से सलाह जरूर लें।

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संतानसुख की कमी का यह है कारण

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

जीवन में स्वस्थ और उत्तम संतान होना सबसे बड़ा सुख माना गया है। दांपत्य जीवन भी तभी सफल माना जाता है, जब उनके यहां स्वस्थ संतान का जन्म हो। इसीलिए नवदंपती को हमेशा बड़े-बुजुर्ग दूधो नहाओ पूतो फलो का आशीर्वाद देते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि आपके यहां उत्तम संतान का जन्म हो और आप खूब तरक्की करें। लेकिन कई दंपतियों को संतान सुख नहीं मिल पाता। पत्नी को लगातार गर्भपात होता हो या तो उनके परिवार में संतान पैदा ही नहीं होती, या फिर पैदा होने के बाद से वह लगातार बीमारियों से घिरी रहती है। कई दंपतियों की संतानें तो पैदा होते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। यह उनके लिए सबसे दुखद घटना होती है।

क्या आप जानते ऐसा क्यों होता है? क्यों कोई दंपती संतान सुख से वंचित रह जाता है? क्यों किसी दंपती की संतानें गंभीर रोगों के साथ जन्म लेती हैं? या क्यों किसी की संतानें जीवित नहीं रह पातीं? ज्योतिष शास्त्र में इसका कारण और इस अत्यंत संकटपूर्ण और दुखद समस्या का निवारण बताया गया है।


ज्योतिष के सिद्धांतों के अनुसार जब व्यक्ति को संतान से जुड़ी समस्याएं आएं तो उस व्यक्ति की जन्मकुंडली में पितृदोष होता है। संतान के अलावा कई बार देखा गया है व्यक्ति के विवाह में भी बड़ी बाधाएं आती हैं। उसके जीवन में कोई काम ठीक से नहीं हो पाता। आर्थिक तंगी हमेशा बनी रहती है और परिवार का कोई न कोई सदस्य हमेशा बीमार बना रहता है। ये सब घटनाएं पितृदोष के कारण होती हैं।

ऐसे बनता है पितृदोष

जन्मकुंडली में पितृदोष है या नहीं, यह ग्रहों की विशेष स्थिति देखकर पता लगाया जाता है।

  • पितृ दोष सूर्य और राहु की युति के कारण बनता है। कुंडली में पंचम स्थान संतान का होता है। जब पंचम स्थान में सूर्य और राहु साथ में बैठे हों।
  • नवम स्थान धर्म स्थान होता है। जब इस स्थान में सूर्य और राहु साथ में बैठे हों।
  • अकेला राहु पंचम और नवम में हो और सूर्य अशुभ स्थिति में हो तो भी पितृदोष माना जाता है।
  • राहु लग्न या द्वितीय स्थान में हो और उसके साथ अन्य कोई शुभ ग्रह न हो या शुभ ग्रह की दृष्टि न हो।
  • नवम स्थान पितरों का स्थान भी माना जाता है। यदि यह स्थान पाप ग्रहों से दूषित है हो पितृदोष बनता है।
  • नवम स्थान का मालिक राहु या केतु से ग्रसित है तो भी पितृदोष का कारण बनता है।

पितृदोष के लक्षण क्या?

आपकी कुंडली में पितृदोष है या नहीं इसका पता जीवन में आ रही परेशानियों और कुछ लक्षणों से लगाया जा सकता है।

  • पितृदोष सबसे अधिक संतान से संबंधित बातों पर प्रभाव डालता है। यदि दंपती की संतानें नहीं हो पा रही हैं। स्त्री को बार-बार गर्भपात हो रहा है। संतान पैदा होने के बाद से बार-बार बीमार हो रही हो। संतान जीवित न रह पा रही हो।
  • विवाह नहीं हो पा रहा हो। सगाई होने के बाद टूट रही हो। 
  • दांपत्य जीवन में लगातार तनाव बना हुआ हो। तलाक तक की नौबत आ रही हो।
  • नौकरी में बार-बार बदलाव हो रहा है। आजीविका का संकट हो।
  • परिवार में अचानक बड़ी-बड़ी समस्याएं आने लगे। कोई सदस्य लगातार बीमार रहे। कोर्ट-कचहरी के मामले चलते रहें।

पितृदोष निवारण कैसे हो?

शास्त्रों के अनुसार किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष तभी बनता है, जब उसके परिवार के मृत परिजनों की कोई इच्छा अधूरी रह गई हो और वादा करने के बाद भी वह पूरी नहीं कर रहे हो। मृत्यु के बाद परिजनों का उत्तरकार्य ठीक से न किया गया हो। श्राद्ध न किया जा रहा हो तो पितृदोष परेशान करता है। इस दोष का निवारण किया जा सकता है। वैसे तो पितृदोष निवारण के लिए सबसे उत्तम समय श्राद्धपक्ष का होता है लेकिन उसके लिए पूरे साल इंतजार करना होता है। ज्योतिष शास्त्र में कई अन्य उपाय बताए गए हैं जिन्हें श्रद्धापूर्वक करके पितृदोष से मुक्ति संभव है:
  • सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ की जड़ में एक जनेउ रखिए और एक जनेउ भगवान विष्णु के नाम से वहीं रखिए। ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते हएु पीपल के पेड़ की 108 परिक्रमा करें और प्रत्येक परिक्रमा के साथ एक-एक मिठाई का टुकड़ा रखते जाएं। परिक्रम पूर्ण होने पर पीपल के वृक्ष और विष्णु भगवान से क्षमा प्रार्थना करें। इससे पितृदोष शांत होता है।
  • श्रावण के महीने में बरगद का वृक्ष लगाएं और प्रतिदिन उसमें एक लोटा जल डालें।
  • शिवलिंग पर प्रतिदिन जल और बेलपत्र अर्पित करें।
  • जरूरतमंदों को अन्न और वस्त्र दान करें।
  • परिवार के बुजुर्गों की सेवा करें। वृद्धाश्रम में यथाशक्ति चीजें दान करें।
  • सोमवार का व्रत करें।
  • रूद्राअष्टक का नियमित पाठ करें।
  • पितरों को याद करके उनके निमित्त किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंदों को भोजन कराएं।
  • श्राद्धपक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान करें।
  • दुर्गा सप्तशती में बताए गए देवी कालिका स्तोत्र का पाठ करें।
  • त्रयंबकेश्वर, नासिक में नारायणबलि पूजा करवाई जाती है।


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महंगे रत्न नहीं, पेड़-पौधों की जड़े करेंगी चमत्कार

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

हम अक्सर लोगों के हाथ में विभिन्न रंग-बिरंगे पत्थर जड़ी अंगुठियां देखते हैं। दरअसल ये रत्न होते हैं जो वे अपने जीवन में आ रही परेशानियों से मुक्ति के लिए और भाग्य चमकाने के लिए किसी ज्योतिषी की सलाह से पहनते हैं। नौ ग्रहों के नौ रत्न होते हैं जिन्हें मुख्य रत्न कहा जाता है। मुख्य रत्नों के अलावा इन सभी के उपरत्न होते हैं। जो व्यक्ति महंगे रत्न नहीं पहने सकते, वे उपरत्न पहनते हैं। लेकिन यदि आप कोई भी रत्न धारण नहीं करना चाहते तो कुछ पेड़-पौधों की जड़ भी होती हैं जिन्हें अपने पास रखने से रत्नों जैसा ही प्रभाव मिलता है। 


ज्योतिष विज्ञान में महंगे रत्नों, उपरत्नों के विकल्प के रूप में पेड़-पौधों की जड़ें पहनी जाती हैं। इससे बुरे ग्रहों का प्रभाव नष्ट होता है और संबंधित ग्रह अनुकूल होता है। आइये जानते हैं कौन-से पेड़-पौधे की जड़ किस ग्रह को प्रसन्न करने के काम आती है और उसका उपयोग कैसे करें।

सूर्य: बेलमूल की जड़ में सूर्य का वास माना गया है। मान-सम्मान, यश, कीर्ति, तरक्की की चाह रखने वालों को रविवार के दिन पिंक कपड़े में इसकी जड़ को बांधकर दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए। सूर्य के बुरे प्रभाव नष्ट होकर शुभ प्रभाव में वृद्धि होती है। अपच, चक्कर आना, हार्ट और रीढ़ से संबंधित रोगों में इससे आराम मिलता है। 
मंत्र - ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
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चंद्र: चंद्रमा से संबंधित बुरे प्रभाव कम करने के लिए खिरनी की जड़ का प्रयोग किया जाता है। सोमवार के दिन सफेद कपड़े में हाथ में बांधने पर इसके शुभ प्रभाव मिलना प्रारंभ हो जाते हैं। चंद्रमा के बुरे प्रभाव के फलस्वरूप व्यक्ति कफ और लिवर संबंधी बीमारियों से हमेशा घिरा रहता है। मानसिक रूप से विचलित रहता है। 
मंत्र - ‘ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः
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मंगल: अनंतमूल की जड़ में मंगल ग्रह का वास होता है। यह जड़ मंगल के बुरे प्रभाव को कम करके, उससे संबंधित जो परेशानियां आ रही होती हैं उन्हें दूर करती है। इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर सीधे हाथ में बांधा जाता है। इसे पहनने का सबसे अच्छा दिन मंगलवार है। इससे त्वचा, लिवर, पाइल्स और कब्ज की समस्या दूर होती है। 
मंत्र - ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
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बुध: विधारा मूल की जड़ का उपयोग बुध के बुरे प्रभाव कम करने के लिए किया जाता है। बुध के बुरे प्रभाव से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता प्रभावित होती है और उसकी निर्णय लेने की क्षमता कम होती है। विधारा मूल की जड़ को बुधवार के दिन हरे रंग के कपड़े में बांधकर सीधे हाथ में उपर की ओर बांधा जाता है। इस जड़ को बांधने वालों को दुर्गा की आराधना करना चाहिए। इसके प्रभाव से नर्वस डिस्ऑर्डर, ब्लड प्रेशर, अल्सर और एसिडिटी में आराम मिलता है।
मंत्र - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
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गुरु: यदि किसी के विवाह में बाधा आ रही हो। कार्य-व्यवसाय, नौकरी में मनचाही तरक्की नहीं मिल पा रही हो तो यह सब गुरु के दुष्प्रभाव के कारण होता है। यदि ऐसा है तो व्यक्ति को हल्दी की गांठ बांधना चाहिए। गुरुवार के दिन पीले कपड़े में हल्दी की गांठ बांधकर पास रखने से कार्यों में सफलता मिलने लगती है। इसके प्रभाव से लिवर, चिकन पॉक्स, एलर्जी और पेट संबंधी रोगों में आराम मिलता है।
मंत्र -  ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
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शुक्र: शुक्र ग्रह के बुरे प्रभाव कम करने के लिए अरंडमूल की जड़ का उपयोग किया जाता है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह रखने वालों को इसकी जड़ का उपयोग करना चाहिए। शुक्रवार के दिन सफेद कपड़े में इसकी जड़ को बांधकर दाहिनी भुजा पर बांधे। इसके प्रभाव से खांसी, अस्थमा, गले और फेफड़ों से संबंधित रोगों में आराम मिलता है।
मंत्र - ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः
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शनि: यदि किसी के जीवन में लगातार दुर्घटनाएं, धन हानि और बीमारी बनी रहती है तो ऐसा व्यक्ति शनि के बुरे प्रभाव से गुजर रहा होता है। इस बुरे प्रभाव को कम करने के लिए धतूरे की जड़ बांधी जाती है। इसे पहनने से सकारात्मक उर्जा का प्रवाह बनता है और व्यक्ति के जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इस की जड़ को शनिवार के दिन काले कपड़े में बांधकर दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए। मस्तिष्क संबंधी रोगों में इस जड़ से बहुत फायदा मिलता है।
मंत्र - ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
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राहु: राहु ग्रह के बुरे प्रभाव कम करने के लिए सफेद चंदन का टुकड़ा या इस पेड़ की जड़ का उपयोग किया जाता है। शनिवार या सोमवार को सफेद या भूरे रंग के कपड़े में इसे बांधकर पास रखा जाता है। महिलाओं को गर्भाशय से संबंधित रोग, त्वचा की समस्या, गैस प्रॉब्लम, दस्त और बुखार में इस जड़ का चमत्कारी प्रभाव देखा गया है। बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं तो भी इस जड़ का प्रयोग करना चाहिए।
मंत्र - ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
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केतु: अश्वगंधा की जड़ का प्रतिनिधि ग्रह केतु है। केतु के शुभ प्रभाव में वृद्धि करने और बुरे प्रभाव कम करने में अश्वगंधा चमत्कार की तरह काम करता है। अश्वगंधा की जड़ को नीले रंग के कपड़े में बांधकर शनिवार को सीधे हाथ में बांधा जाता है। इसके प्रभाव से स्मॉलपॉक्स, यूरीन इंफेक्शन और त्वचा संबंधी रोगों में आराम मिलता है। जीवन में चल रही मानसिक परेशानियां भी इससे कम होती हैं।
मंत्र - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः
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ध्यान रखने योग्य बातें

  1. प्रत्येक पेड़ या पौधे की जड़ को शुभ मुहूर्त जैसे रवि पुष्य, गुरु पुष्य या अन्य शुभ मुहूर्त से एक दिन पहले रात को निमंत्रण दिया जाता है। उसके बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त या शुभ चौघडि़या देखकर घर लाना चाहिए।
  2. जड़ को कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर पूजा स्थान में रखना चाहिए। इसके बाद उससे संबंधित ग्रह के मंत्र की एक माला जाप करें।
  3. सुगंधित घूप लगाने के बाद अपनी मनोकामना पूरी करने का संकल्प लें और उसे बांध लें।
  4. जड़ को कपड़े की बजाय चांदी के ताबीज में भरकर भी पहना जा सकता है।

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Thursday, 29 March 2018

लग्न से जानिए किस वर्ष में होगा भाग्योदय

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य
एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है, समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता। यानी जब वक्त आएगा तभी आपको वो सब मिलेगा जो आप चाहते हैं। उससे पहले जीवन सामान्य चलता रहता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि आप मेहनत करना छोड़ दें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भाग्यवादी बनने की बजाय कर्मवादी बनने पर जोर दिया है। यह पूर्णतः सत्य है। कर्म करने से ही भाग्य खुलता है, लेकिन क्या आप जानते हैं आपका भाग्य कब खुलेगा।


इसका जवाब ज्योतिष देता है। बेशक आप कर्म करते रहें, लेकिन आप जीवन में सारे सुख, भोग, ऐश्वर्य तभी हासिल कर पाएंगे जब आपका भाग्योदय होगा। भाग्य खुलते ही आपके जो काम अब तक धीमी गति से हो रहे थे वे फटाफट होने लगेंगे। जीवन में समस्त सुख प्राप्त हो जाएंगे। धन, संपत्ति, भोग विलास के साधन मिल जाएंगे। 

भाग्योदय कब होगा यह जातक की जन्म कुंडली के लग्न स्थान यानी प्रथम भाव को देखकर बताया जा सकता है। मेष से लेकर मीन तक 12 लग्न होते हैं। इनमें से प्रत्येक के लिए भाग्योदय के वर्ष तय हैं। जो लग्न होगा उसी के अनुसार बताए गए वर्ष में भाग्योदय होगा। 

आइये जानते हैं आपके लग्न के अनुसार कब खुलेगा आपकी किस्मत का ताला...

मेष लग्न : 16वां, 22वां, 28वां, 32वां और 36वां वर्ष भाग्योदयकारी होता है।
वृषभ लग्न : 25, 28, 36 और 42वें वर्ष में भाग्योदय का अवसर आता है।
मिथुन लग्न : 22, 32, 35, 36 और 42वें वर्ष में किस्मत का ताला खुलता है।
कर्क लग्न : 16, 22, 24, 25, 28 और 32वें वर्ष में भाग्योदय होता है।
सिंह लग्न : 16, 24, 26, 28 और 32वां वर्ष भाग्योदयकारी साबित होता है।
कन्या लग्न : 16, 22, 25, 32, 33, 35 और 36वां वर्ष शुभ होता है।
तुला लग्न : 24, 25, 32, 33 और 35वें वर्ष में भाग्योदय होता है।
वृश्चिक लग्न : 22, 24, 28, 32वां वर्ष किस्मत खोलने वाला होता है।
धनु लग्न : 16, 22 और 32वें वर्ष में भाग्योदय होता है।
मकर लग्न : 25, 33, 35, 36वां वर्ष शुभ होता है।
कुंभ लग्न : 25, 28, 36, 42वां वर्ष भाग्योदयकारी।
मीन लग्न : 16, 22, 28, 33वें वर्ष में भाग्योदय होता है।

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हाथों की लकीरें बता सकती है विदेश जाने के योग हैं या नहीं

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य
अधिकांश लोगों का सपना होता है कि वे विदेश यात्रा करें। विदेशों में घूमें-फिरे और मौज मस्ती करें, लेकिन कई लोगों का सपना केवल एक सपना ही बनकर रह जाता है, वे विदेश तो क्या अपना देश ही पूरा नहीं घूम पाते। कई लोगों को बिजनेस के सिलसिले में या युवाओं को पढ़ाई के उद्देश्य से विदेश जाने की जरूरत होती है, लेकिन वे जा नहीं पाते। या विदेश पहुंच भी जाते हैं तो वह उनके लिए फलीभूत नहीं होता, वे वहां जाकर भी कई तरह की परेशानियों से घिरे रहते हैं। 



जातक की जन्म कुंडली की तरह ही हस्तरेखा में भी विदेश यात्रा के योग देखे जा सकते हैं। आइये जानते हैं हस्तरेखा में विदेश यात्रा के योग कैसे बनते हैं:

विदेश यात्रा के कारक ग्रह चंद्र, शुक्र और राहु माने गए हैं। हस्तरेखा में विदेश यात्रा का योग चंद्र पर्वत, चंद्र रेखा, भाग्य रेखा और जीवन रेखा को देखकर बताया जाता है। हथेली में चंद्र पर्वत कनिष्ठिका यानी सबसे छोटी अंगुली के नीचे बुध पर्वत के बाद से लेकर मणिबंध तक का क्षेत्र होता है। इस पर मौजूद खड़ी रेखाएं चंद्र रेखाएं होती हैं।

इस तरह बनते हैं योग

  1. चंद्र पर्वत उन्नत, लालिमा लिए हुए, चिकना, कोमल और रेखाओं के जाल युक्त स्पष्ट सुंदर हो तथा इस पर एक स्पष्ट गहरी लाल रेखा हो तथा साथ में भाग्य रेखा भी बिना कटी-फटी हो तो व्यक्ति निश्चित रूप से विदेश यात्राएं करता है।
  2. चंद्र पर्वत के ठीक मध्य में वर्ग का चिन्ह हो और भाग्य के उद्गम स्थल पर मछली के आकार का चिन्ह हो तो व्यक्ति समुद्र पारीय देशों की यात्रा करता है।
  3. जिस व्यक्ति की भाग्य रेखा स्पष्ट, लालिमा लिए हुए हो और अपने अंतिम स्थान पर गुरु पर्वत की ओर झुक जाए वह व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन अर्जित करता है।
  4. भाग्य रेखा जिस स्थान पर जीवन रेखा से मिलती हो और ठीक उसी स्थान पर चंद्र पर्वत से आकर एक रेखा मिलती हो तो व्यक्ति का अधिकांश समय विदेश में व्यतीत होता है।
  5. चंद्र पर्वत पर मछली के आकार का चिन्ह हो तो जातक शिक्षा के क्षेत्र में विदेशों में विशेष सफलता हासिल करता है।
  6. चंद्र पर्वत पर स्वस्तिक का चिन्ह हो तो व्यक्ति न केवल अपने देश, बल्कि विदेशों में भी बड़ा पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
  7. जीवन रेखा, भाग्य रेखा स्पष्ट हो और इन पर नक्षत्र, त्रिभुज, जाल आदि चिन्ह न हो और चंद्र पर्वत उन्नत हो तो व्यक्ति जीवन में कई बार हवाई और समुद्री यात्राएं करता है।
  8. चंद्र पर्वत से अनेक रेखाएं निकलकर उपर की ओर बढ़ रही हों तथा उनमें से कोई एक रेखा सूर्य रेखा से जाकर मिले तो ऐसा जातक विदेशों में किसी बड़े सरकारी पद पर प्रतिष्ठित होता है।
  9. चंद्र रेखा यदि बुध रेखा से जाकर मिले तो व्यक्ति विदेश में बड़ा बिजनेस जमाता है।
  10. चंद्र रेखा से चलकर कोई रेखा गुरु पर्वत तक पहुंचे तो व्यक्ति का विवाह विदेश में होता है।


विदेश यात्रा के योग बनाने के लिए उपाय

यदि आप भी विदेश जाने की ख्वाहिश रखते हैं और कोई योग नहीं बन पा रहा है तो सबसे पहले आपको चंद्र को प्रसन्न करने के उपाय करना होंगे। इसके लिए प्रतिदिन चांदी के गिलास से पानी पीयें। मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं। चंद्र से संबंधित चीजों दूध, दही का दान करें। गरीबों को चावल का दान दें। चांदी का कोई आभूषण धारण करके रखें।

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Wednesday, 28 March 2018

वास्तु के अनुसार कैसी हो दुकान...

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का प्रकृति के प्रत्येक कण पर प्रभाव पड़ता है। कोई माने या ना माने वे सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। आज हम बात कर रहे हैं बिजनेस की। व्यक्ति अपने सपने को साकार करने के लिए बिजनेस या दुकान शुरू करता है, लेकिन कई बार खूब मेहनत करने के बाद भी कई लोगों को बिजनेस में उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल पाती। इसका कारण दुकान या बिजनेस प्लेस पर वास्तु दोष हो सकता है। वास्तु शास्त्र में बिजनेस में सफलता के लिए कई नियम और सिद्धांत बताए गए हैं। यदि उनका पालन किया जाए तो सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।



किस दिशा में हो दुकान का मुख
वास्तु शास्त्र मुख्यत: दिशाओं पर निर्भर करता है। बिजनेस प्रतिष्ठान और दुकान का मुंह किस तरफ हो यह सबसे महत्वपूर्ण है। पूर्व मुखी दुकान सबसे उत्तम मानी गई है। दुकान का मुंह पश्चिम की ओर है तो इसमें अधिक लाभ नहीं मिलता। उत्तरमुखी दुकानें धन वृद्धि और समृद्धि के लिहाज से सबसे अच्छी होती है। दक्षिण मुखी दुकानें भी ठीक नहीं होती है, लेकिन यदि दुकान मालिक की कुंडली के सितारे अच्छे हैं तो दक्षिण मुखी में भी लाभ मिलता है।

काउंटर की दिशा किस तरफ हो
दुकान के मालिक या सेल्समैन का मुंह दुकान या कमर्शियल ऑफिस में बैठते समय पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए। यदि काउंटर या मालिक के बैठने की सीट दक्षिण या पश्चिम मुखी है तो कई तरह की परेशानियां बनी रहेंगी। बिजनेस में सफलता मिलने में भी संदेह रहेगा। यदि दुकान किसी मार्केट में है और दक्षिण मुखी है और दुकान के सामने की लाइन में भी दुकानें हैं तो ऐसी दक्षिण मुखी दुकानें खराब नहीं मानी जाती है।

कैसा हो दुकान का आकार

  1. दुकान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आगे की ओर कम चौड़ी और पीछे की ओर ज्यादा चौड़ी है तो इसे गौमुखी दुकान कहा जाता है। ऐसी दुकानें ठीक नहीं मानी जाती है। इनमें धन की आवक कम होती है।
  2. यदि दुकान आगे की ओर अधिक चौड़ी और पीछे कम चौड़ी है तो इसे सिंहमुखी दुकान कहा जाता है। बिजनेस के लिए देसी दुकानें अच्छी मानी जाती हैं। इनमें धन की आवक खूब होती है।
  3. चारों कोणों से समान और वर्गाकार तथा आयताकार दुकानें शुभ मानी गई हैं।
  4. त्रिकोण, सभी कोणों की अलग-अलग लंबाई-चौड़ाई या कोई कोना अधिक निकला हुआ हो तो ऐसी दुकानें अशुभ होती है। ऐसी दुकानें मालिक के लिए मानसिक परेशानी का कारण बनती है। पैसों की भी हानि होती है।
  5. दुकान का फर्श हमेशा साफ-सुथरा और आकर्षक होना चाहिए।
  6. दुकान में काउंटर के दाहिनी ओर या उत्तर-पूर्वी कॉर्नर में गणेश और लक्ष्मी की प्रतिमाएं स्थापित करना चाहिए।
  7. दुकान की दीवारों पर शुभ चिन्ह जैसे स्वस्तिक, शुभ-लाभ, रिद्धि-सिद्धि लगाना चाहिए। कैश काउंटर का मुंह उत्तर की ओर होना चाहिए तथा कैश बॉक्स कभी खाली नहीं होना चाहिए।
  8. अपने ईष्ट देवता या जिन देवी-देवता को आप मानते हैं, सुबह-शाम दुकान में उनका ध्यान जरूर करना चाहिए। उनकी तस्वीर या प्रतिमा के सामने दीपक, अगरबत्ती जरूर लगाएं।
  9. दुकान के ठीक सामने पेड़ या खंभा हो तो यह वेध कहलाता है। यह शुभ नहीं होता है। इससे बिजनेस में दिक्कतें आती हैं।
  10. दुकान के उत्तर-पूर्वी भाग को खाली रखें तो ज्यादा बेहतर होगा। भारी वस्तुएं दक्षिण-पश्चिमी भाग में रखना चाहिए।


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जिंदगी को जहर बना देता है विष योग


पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य
ज्योतिष शास्त्र में अनेक योगों का वर्णन मिलता है। ये योग दो या दो से अधिक ग्रहों के आपस में संबंध से बनते हैं। यदि शुभ ग्रहों की युति हो तो शुभ योग का निर्माण होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का जीवन सुखों से भर जाता है। लेकिन यदि अशुभ ग्रहों के कारण योग बन रहा है, तो व्यक्ति का जीवन नर्क के समान हो जाता है। ऐसा ही एक अशुभ योग है 'विष योग"।



जन्म कुंडली में विष योग का निर्माण शनि और चंद्रमा की युति से होता है। यह योग जातक के लिए बेहद कष्टकारी माना जाता है। नवग्रहों में शनि को सबसे मंद गति के लिए जाना जाता  है और चंद्र अपनी तीव्रता के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन शनि अधिक पॉवरफुल होने के कारण चंद्र को दबाता है। इस तरह यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के किसी स्थान में शनि और चंद्र साथ में आ जाएं तो विष योग बन जाता है। इसका दुष्प्रभाव तब अधिक होता है जब आपस में इन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा चल रही हो। विष योग के प्रभाव से व्यक्ति जीवनभर अशक्तता में रहता है। मानसिक रोगों, भ्रम, भय, अनेक प्रकार के रोगों और दुखी दांपत्य जीवन से जूझता रहता है। यह योग कुंडली के जिस भाव में होता है उसके अनुसार अशुभ फल जातक को मिलते हैं।
किस भाव में विष योग का क्या प्रभाव
  • यदि किसी जातक के लग्न स्थान में शनि-चंद्र का विष योग बन रहा हो, तो ऐसा व्यक्ति शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम रहता है। उसे पूरा जीवन तंगहाली में गुजारना पड़ता है। लग्न में शनि-चंद्र होने पर उसका प्रभाव सीधे तौर पर सप्तम भाव पर भी होता है। इससे दांपत्य जीवन दुखपूर्ण हो जाता है। लग्न स्थान शरीर का भी प्रतिनिधित्व करता है इसलिए व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर और रोगों से घिरा रहता है।
  • दूसरे भाव में शनि-चंद्र की युति होने पर जातक जीवनभर धन के अभाव से जूझता रहता है।
  • तीसरे भाव में बना विष योग व्यक्ति का पराक्रम कमजोर कर देता है और वह अपने भाई-बहनों से कष्ट पाता है।
  • चौथे भाव सुख स्थान में शनि-चंद्र की युति होने पर सुखों में कमी आती है और मातृ सुख नहीं मिल पाता है।
  • पांचवें भाव में यह दुर्योग होने पर संतान सुख नहीं मिलता और व्यक्ति की विवेकशीलता समाप्त होती है।
  • छठे भाव में विष योग बना हुआ है तो व्यक्ति के अनेक शत्रु होते हैं और जीवनभर कर्ज में डूबा रहता है।
  • सातवें स्थान में होने पर पति-पत्नी में तलाक होने की नौबत तक आ जाती है।
  • आठवें भाव में बना विष योग व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट देता है। दुर्घटनाएं बहुत होती हैं।
  • नौवें भाव में विष योग व्यक्ति को भाग्यहीन बनाता है। ऐसा व्यक्ति नास्तिक होता है।
  • दसवें स्थान में शनि-चंद्र की युति होने पर व्यक्ति के पद-प्रतिष्ठा में कमी आती है। पिता से विवाद रहता है।
  • ग्यारहवें भाव में विष योग व्यक्ति के बार-बार एक्सीडेंट करवाता है। आय के साधन न्यूनतम होते हैं।
  • बारहवें भाव में यह योग है तो आय से अधिक खर्च होता है।

हर माह बनता है विष योग
गोचर चक्र में हर महीने कम से कम एक बार विष योग जरूर बनता है। क्योंकि चंद्रमा गोचर करते हुए महीने में एक बार शनि के साथ जरूर आता है। उस समय वह जिस स्थान में शनि के साथ युति करता है, उसके अनुसार व्यक्ति को कष्ट मिलता है।

कैसे बचें इस योग से
  • जिस जातक की कुंडली में या राशि में विष योग बना हो वे शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे नारियल फोड़ें।
  • शनिवार के दिन सरसो के तेल में काले उड़द और काले तिल डालकर दीपक जलाएं।
  • पानी से भरा घड़ा शनि या हनुमान मंदिर में दान करें।
  • हनुमानजी की आराधना से विष योग से बचाव होता है।
  • शनिवार के दिन कुएं में कच्चा दूध डालें।


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Tuesday, 27 March 2018

वास्तु टिप्स : कॅरियर में सफलता के लिए इन बातों का रखें ध्यान


पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक उद्देश्य होता है उसका कॅरियर। युवाओं को सही समय पर सही कॅरियर गाइडेंस मिल जाए तो जीवन में उन्हें पीछे पलटकर नहीं देखना पड़ता। लेकिन कई युवा अपनी मेहनत से अच्छी नौकरी हासिल तो कर लेते हैं, लेकिन एक समय के बाद उसमें स्थायित्व आ जाता है। कॅरियर ग्रोथ रूक जाती है। इसका कारण आपके दफ्तर में या आप जिस जगह बैठते हैं वहां वास्तुदोष हो सकता है। आइये जानते हैं अपने ऑफिस में आप किन बातों का ध्यान रखकर और किन बातों से बचकर सफलता पा सकते हैं।
क्या करना चाहिए
1. आपके दफ्तर में केबिन या जहां आप बैठते हैं उसके पीछे की दीवार एक तरह से सपोर्ट का काम करती है। इस दीवार को कभी खाली न रखें। इस पर पहाड़ों का वॉल पेपर लगाएं।
2. आपकी कुर्सी के सामने और आसपास खुली जगह होना चाहिए। यह खुले दिमाग का प्रतीक है। दिमाग खुला रहेगा तो नए आइडिया आएंगे और आप दफ्तर में अपने समकक्षों से तेजी से आगे बढ़ेंगे।
3. कांफ्रेंस रूम में कोशिश करें कि आप दक्षिण-पश्चिम दिशा में या टेबल की दक्षिण-पश्चिम दिशा में बैठें। यह भी ध्यान रखें कि कांफ्रेंस रूम में एकदम प्रवेश द्वार के समीप न बैठें।
4. आपके केबिन में रखी टेबल वर्गाकार या आयताकार होना चाहिए। गोल किनारों वाली टेबल नहीं होना चाहिए।
5. फर्नीचर लकड़ी का होना सबसे बेहतर होता है।
6. यदि आपका केबिन ऑफिस की पश्चिमी दिशा में है तो टेबल का टॉप ग्लास का होना चाहिए।
7. यदि केबिन का कोई भी फर्नीचर टूटा हुआ है तो उसे तुरंत रिपेयर करवाएं या बदल दें।
8. आपके बैठने की कुर्सी का बैक, यानी जिस पर आप टिकते हैं उसकी ऊंचाई आपके सिर से अधिक होना चाहिए।
9. यदि आपका बिजनेस है तो बैठते समय आपका मुंह उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए। उत्तर सबसे बेहतर होता है।
10. अपने ऑफिस केबिन के दक्षिण-पूर्वी कोण यानी आग्नेय कोण में एक लाइट लैंप या कोई पौधा जरूर लगाएं।

यह बिलकुल न करें

1. बीम के नीचे न बैठें।
2. बैठते समय केबिन का दरवाजा आपकी पीठ की तरफ न हो।
3. अपने पीछे की दीवार पर वॉटर फॉल या नदी का चित्र न लगाएं। 
4. अपनी सीट पर क्रॉस लेग होकर कभी न बैठें।
5. कार्यस्थल पर शोरगुल, हल्ला नहीं होना चाहिए।
6. मेटल या प्लास्टिक फर्नीचर का इस्तेमाल न करें।
7. अपने केबिन में नकारात्मकता दर्शाती तस्वीरें जैसे युद्ध, हिंसा, रोते हुए बच्चे, रोती हुई महिला न लगाएं।
8. यदि घर में ही ऑफिस बना रखा है तो मास्टर बेडरूम और ऑफिस रूम एक साथ न हों।
9. ऑफिस केबिन या अपनी डेस्क पर बिखरी हुई फाइलें, दस्तावेज बिलकुल न रखें।
10. केबिन में सूखे हुए या नकली फूल नहीं रखना चाहिए।

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हनुमानजी को अर्पित करें लाल चंदन, देखें चमत्कार

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

लाल रंग का हनुमानजी से विशेष संबंध है। मंगलवार को हनुमानजी का जन्म हुआ था और यह दिन मंगल ग्रह का है जिसका रंग लाल है। इसलिए हनुमान जी को भी यह रंग अत्यंत प्रिय है। लाल चंदन में भी मंगल का वास माना गया है और यह हनुमान जी को प्रिय है। इसलिए हनुमान जयंती के विशेष दिन पर लाल चंदन का प्रयोग करके धन-संपदा प्राप्त की जा सकती है।



1. हनुमान जयंती के दिन सूर्योदय के समय उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर लाल कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। सामने एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर हनुमानजी का चित्र स्थापित करें। उन्हें लाल फूलों की माला अर्पित करें। अब लाल चंदन की माला से ऊं हं हनुमते नमः मंत्र की पांच माला जाप करें। जाप प्रारंभ करने से पहले धन प्राप्ति की कामना का संकल्प करें। पांच माला पूरी होने के बाद बेसन की मिठाई का भोग लगाएं। हनुमानजी को अर्पित किए हुए लाल पुष्पों में से एक लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें। इससे शीघ्र ही धन की आवक बढ़ने लगती है।

2. हनुमान जयंती के दिन पीपल के 21 पत्ते लें। इन्हें शुद्ध जल और गंगाजल से धोकर अपने पूजा स्थान में बैठें। लाल चंदन घिसकर उससे प्रत्येक पत्ते पर राम लिखें। इन पत्तों की विधिवत पूजा करके स्थायी संपत्ति की कामना करें। हनुमान जयंती की शाम को इन्हें नदी में प्रवाहित करें। इससे व्यापारियों को बिजनेस में लाभ मिलता है। भूमि, भवन स्थायी संपत्ति की प्राप्ति होती है। जिन लोगों का अपना मकान नहीं है वे भी इस प्रयोग से शीघ्र ही अपने स्वयं के मकान में चले जाते हैं।

3. हनुमान जयंती के दिन लाल चंदन को घिसकर पतला कर लें। उससे हनुमानजी की प्रतिमा को स्नान करवाएं। इसके बाद प्रतिमा पर से थोड़ा सा लाल चंदन लेकर अपने मस्तक पर तिलक लगाएं। इससे वे प्रसन्न होंगे और मनचाही इच्छा पूरी करेंगे। जो लोग वाहन, मशीनरी या लौह संबंधी चीजों का बिजनेस करते हैं इससे उनके बिजनेस में अप्रत्याशित सफलता मिलने लगती है।

4. हनुमान जयंती के दिन लाल चंदन का लेप शिवलिंग पर लगाने से हनुमान और शिव दोनों की अनुकूलता प्राप्त होगी और शीघ्र कर्ज मुक्ति होगी।

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Monday, 19 March 2018

ललाट पर बना स्वस्तिक बना सकता है करोड़पति


पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

हस्तरेखा की तरह फेस रीडिंग यानी चेहरा देखकर व्यक्ति के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में सारी बातें बता देना भारत समेत दुनियाभर में काफी प्रचलित है। कई एक्सपर्ट रीडर हैं जो पल भर में चेहरा देखकर बता सकते हैं कि सामने वाले व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है। इस विधा में चेहरे के प्रत्येक भाग यानी ललाट, भौहें, आंखें, नासिका, कान, गाल, ठोड़ी के आकार, प्रकार, रंगत देखकर भविष्य कथन किया जाता है। यह लक्षण शास्त्र भी कहलाता है। आइये आज जानते हैं ललाट के आकार, इस पर मौजूद रेखाओं और विभिन्न चिन्हों के बारे में।

ललाट यानी माथे का आकार

किसी व्यक्ति का भविष्य कथन करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है उसका ललाट। ललाट का आकार काफी कुछ कहता है। यदि ललाट चौड़ा है तो यह व्यक्ति के भाग्यशाली होने का सूचक है। चौड़ा मस्तक व्यक्ति को धनवान, बलशाली, समाज में प्रतिष्ठित नागरिक बनाता है। ऐसा व्यक्ति अपने शत्रुओं को परास्त करने में कामयाब होता है और सर्वत्र उसकी विजय होती है। बड़े राजनेता, उच्च अधिकारी, बड़े कॉर्पोरेट घराने से जुड़े लोगों का ललाट चौड़ा होता है। ऐसे व्यक्ति को जीवन के समस्त सुख, भोग, ऐश्वर्य और भौतिक सुख सुविधाएं प्राप्त हो जाती है।
  • इसके विपरीत यदि ललाट छोटा हो तो ऐसे व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता कमजोर होती है। इनके पास धन की कमी हमेशा बनी रहती है। प्रत्येक कार्य में सफलता मिलने में संदेह रहता है और बहुत मेहनत करने के बाद भी व्यक्ति को उसका मनचाहा मुकाम हासिल नहीं हो पाता।
  • सामान्य आकार का ललाट व्यक्ति के संतुलित जीवन जीने का संकेत देता है।

क्या कहते हैं ललाट पर बने चिन्ह

ललाट पर रेखाओं के अलावा अन्य कई तरह के चिन्ह होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन की विभिन्न बातों का राज बताते हैं।
  1. यदि ललाट पर त्रिशूल का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति दीर्घायु होता है।
  2. ललाट पर सीप जैसा चिन्ह हो तो वह व्यक्ति टीचर तथा आदर्श जीवन जीने वाला व्यक्ति होता है।
  3. जिसके ललाट पर नीली नसें दिखाई देती हों, वे पापी किस्म के, धूर्त व्यक्ति होते हैं।
  4. ललाट पर स्वस्तिक का चिन्ह बना हो तो ऐसा व्यक्ति करोड़पति होता है।
  5. जिनके ललाट पर अर्धचंद्र दिखाई दे तो वे प्रसिद्ध उद्योगपति बनते हैं।
  6. ललाट पर वज्र या धनुष का चिन्ह हो तो वे अतुल संपत्ति के स्वामी होते हैं।
  7. ललाट पर बना शंख का चिन्ह व्यक्ति को सौभाग्यशाली बनाता है।
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हनुमान जयंती पर तीन प्रयोग से होगा भाग्योदय

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

प्रत्येक व्यक्ति चाहता है, उसके जीवन में कोई परेशानी ना हो, उसे सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति हो, धन की कभी कमी ना हो और उसका व्यक्तित्व ऐसा आकर्षक बन जाए कि कोई भी उससे प्रभावित हुए बिना ना रह पाए। यह सब तभी संभव हो पाता है जब व्यक्ति का भाग्योदय हो। बिना भाग्योदय के जीवन सामान्य ही रहता है। हनुमानजी को पृथ्वी का जाग्रत देव माना गया है, यानी हनुमानजी पृथ्वी पर अब भी मौजूद हैं। वे अपने भक्तों को समस्त सुख प्रदान करने में सक्षम हैं।


हनुमान पूजा का तंत्र शास्त्र में भी बड़ा महत्व है। 31 मार्च को आ रही हनुमान जयंती पर तंत्र शास्त्र में बताए गए तीन चमत्कारिक प्रयोग करके आप भी अपना भाग्योदय स्वयं कर सकते हैं।

पहला प्रयोग: मीठा पान

हनुमानजी को मीठा पान अत्यंत प्रिय है। हनुमान जयंती के दिन हनुमानजी को मीठा पान जरूर भेंट करें। पान में पांच प्रकार की वस्तुएं होना चाहिए। कत्था, गुलकंद, खोपरा, सौंफ और गुलाबकतरी। इनके अलावा चूना, सुपारी और अन्य कोई वस्तु बिलकुल नहीं हो। इस पान से हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होते हैं और मनचाही वस्तु प्रदान कर देते हैं।

दूसरा प्रयोग: लाल झंडा

हनुमान जयंती के दिन हनुमान मंदिर के शिखर पर तिकोना लाल झंडा लगवाएं। इससे सर्वत्र विजय हासिल होती है। जीवन की समस्त परेशानियों का हल निकलता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। कोर्ट-कचहरी, मुकदमों में जीत मिलती है। हनुमान की छत्रछाया हमेशा आप पर बनी रहेगी।

तीसरा प्रयोग: आंकड़े की माला

सफेद आंकड़े के 21 पत्तों पर केसर-चंदन से राम-राम लिखकर उनकी माला बनाकर हनुमानजी को पहनाएं। इस प्रयोग से भाग्य के रास्ते में आ रही समस्त बाधाएं समाप्त होती हैं और व्यक्ति के जीवन में सफलता के द्वार खुलते चले जाते हैं। हनुमानजी को सुगंधित इत्र भी भेंट करें।
हमारे यूट्यूब चैनल पर इसका वीडियो देखें:  https://www.youtube.com/watch?v=xTRuGtjIW0A

18 अप्रैल से शनि होंगे वक्री

छह राशि की खुलेगी लॉटरी, चार राशि वाले रहें सावधान!

पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

वैशाख शुक्ल तृतीया 18 अप्रैल 2018 को प्रातः 7 बजकर 20 मिनट से भाद्रपद कृष्ण एकादशी 6 सितंबर 2018 को सायं 4 बजकर 44 मिनट तक शनि धनु राशि में वक्री रहेंगे। शनि के वक्री होने पर व्यक्ति को अपनी महत्वाकांक्षाओं एवं असीमित इच्छाओं पर अंकुश लगाना चाहिए। क्योंकि शनि के वक्रत्व काल में व्यक्ति असुरक्षित, अंतर्विरोधी, असंतोषी, अशांत एवं अनात्मीयता का अनुभव करता है। ऐसे में उसके आत्मविश्वास में कमी आ जाती है तथा अपने शक्की स्वभाव के कारण अपने प्रियजनों को ही अपना शत्रु बना बैठता है। शनि के वक्री होने पर व्यक्ति आत्मकेंद्रित होकर स्वार्थी बन जाता है।


जन्मस्थ वक्री शनि वाले जातक भाग्यवादी होते हैं तथा ऐसा मानते हैं कि उनके प्रत्येक क्रिया कलाप किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित हैं। वे एकांतवादी होकर अपने सहयोगियों, मित्रों, रिश्तेदारों, परिजनों से किनारा कर लेते हैं एवं अपनी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह रहते हैं। ऐसे व्यक्ति उपर से साहसी, सिद्धांतवादी एवं कठोर अनुशासनप्रिय होने का दिखावा करते हैं लेकिन भीतर से खोखले, डरपोक व लचीले स्वभाव के होते हैं।

आइये जानते हैं 18 अप्रैल से 142 दिनों के लिए वक्री हो रहे शनि किस राशि पर क्या प्रभाव दिखाने वाले हैं। 

शनि तुला राशि में उच्च का होता है और मेष राशि में नीच का। मकर और कुंभ इसकी अपनी राशियां हैं। शनि के मित्र ग्रह हैं बुध, शुक्र, राहु, केतु और शत्रु ग्रह हैं सूर्य, चंद्र, मंगल। गुरु के साथ इसका सम व्यवहार होता है। वर्तमान में शनि बृहस्पति की राशि धनु में गोचर कर रहे हैं और इसी राशि में वक्री होने जा रहे हैं।

छह राशि वालों की खुलेगी लॉटरी

मित्र ग्रहों की राशियों मिथुन-कन्या, वृषभ-तुला और स्वयं की राशि मकर-कुंभ के लिए शनि का वक्री होना कई तरह की सौगातें लेकर आ सकता है। इन छह राशि वाले जातकों के लिए 18 अप्रैल से 142 दिनों के समय में भाग्योदय के कई अवसर मिलेंगे, लेकिन उन अवसरों को पहचानना होगा। अन्यथा मौका हाथ से निकल जाएगा। इन छह राशि वालों के संपत्ति खरीदने के योग बनेंगे। यदि अब तक भूमि, भवन खरीदने के कार्य टलते आ रहे हैं तो इन 142 दिनों में वे सारे कार्य बिना किसी बाधा के संपन्न हो सकेंगे। हालांकि इन राशि वालों को यह ध्यान रखना होगा कि इनकी किस्मत इन्हें सातवें आसमान पहुंचा देगी तो भी इन्हें अपने पैर जमीन पर ही जमाए रखना होंगे। अर्थात सफलता का घमंड हावी नहीं होना चाहिए, वरना आप अपने परिजनों, प्रिय मित्रों और सहयोगियों से दूर हो जाएंगे। इन राशि वालों को अचानक कहीं से धन प्राप्त होगा। कोई बड़ा प्रोजेक्ट कोई योजना हासिल होगी। इन राशि के विद्यार्थी विदेश यात्रा करेंगे। इनकी परेशानियों में इस दौरान कमी आएगी।

चार राशि वाले रहें सावधान

शत्रु ग्रहों की राशियों सिंह, कर्क, मेष-वृश्चिक के लिए शनि का वक्री होना परेशानियां बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। इन चार राशि वाले जातक अब तक जिन संकटों से घिरे हुए हैं उनसे बाहर निकलने का रास्ता फिलहाल नजर नहीं आएगा। इन राशि वालों की जन्मकुंडली में यदि शनि वक्री है तो और भी दिक्कत वाली बात है। इन लोगों को बीमारियों पर बेतहाशा पैसा खर्च करना पड़ेगा। वाद-विवाद की स्थितियां बनेगी। वाहन दुर्घटना की आशंका रहेगी। व्यापारियों को धन हानि, नौकरीपेशा व्यक्तियों की नौकरी छूट सकती है। दांपत्य जीवन और मानसिक स्थिति में भी वक्री शनि डिस्टर्बेंस पैदा करेगा। शनि के प्रकोप से बचने के लिए इन राशि वाले जातकों के लिए यह अत्यंत आवश्यक होगा कि वे बुरे कर्मों से दूर रहें। किसी की बुराई में लगें। सत्कर्म करने वालों से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

दो राशियों को मिलाजुला फल मिलेगा

शनि के सम ग्रह बृहस्पति के आधिपत्य में आने वाली दो राशियों धनु और मीन के जातकों के लिए वक्री शनि का मिलाजुला असर होगा। कठोर परिश्रम से इन राशि के जातक सफलता अर्जित कर लेंगे, लेकिन ध्यान रहे आलस्य और नकारात्मकता को अपने उपर हावी न होने दें। स्वयं को किसी न किसी कार्य में लगाए रखेंगे तो शनिदेव प्रसन्न होंगे।

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खुद पहनकर महसूस कीजिए क्रिस्टल ब्रेसलेट का प्रभाव


पं. गजेंद्र शर्मा, ज्योतिषाचार्य

यह सार्वभौमिक सत्य है कि ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु में एनर्जी है, चाहे वह जिंदा वस्तु हो या मृत। मनुष्य हो या पेड़-पौधे, पत्थर हो या मिट्टी, हर वस्तु एक विशेष प्रकार की ऊर्जा से संचालित होती है। यह ऊर्जा सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। यही ऊर्जा ग्रहों में भी होती है और प्रत्येक ग्रह के कुछ प्रतिनिधि क्रिस्टल होते हैं। इन क्रिस्टल में ऊर्जा को सोखने की श
क्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र में किसी ग्रह विशेष की पीड़ा से मुक्ति के लिए उस ग्रह से संबंधित रत्न पहनाया जाता है। एक से अधिक समस्याओं के लिए अधिक रत्नों का विशेष कॉम्बीनेशन भी पहनाया जाता है।

क्रिस्टल ब्रेसलेट एक ऐसा ही रत्नों के विशेष संयोजन से बना ब्रेसलेट होता है, जो व्यक्ति के शरीर की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा को बैलेंस करता है। यह ब्रेसलेट किसी भी आयु का व्यक्ति पहन सकता है, लेकिन पहनने से पहले किसी क्रिस्टल हीलर की सलाह लेना आवश्यक होता है। बिना सोचे समझे केवल फैशन के लिए क्रिस्टल ब्रेसलेट पहनने से परिणाम विपरीत भी हो सकते हैं।

कब पहनना चाहिए क्रिस्टल ब्रेसलेट
अक्सर हम महसूस करते हैं कि जरा सा काम करने में थकान होने लगती है। दिनभर मन में एक अजीब सी उदासी छाई रहती। घर-दफ्तर के किसी काम में मन नहीं लगता। मानसिक बेचैनी मन में बनी रहती हो तो संभव है आपके भीतर नकारात्मक ऊर्जा बढ़ गई हो। नकारात्मक ऊर्जा का असर आपके जॉब, कॅरियर, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति पर भी होता है। इस स्थिति में आपको क्रिस्टल ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

क्या है लाभ

  • क्रिस्टली ब्रेसलेट पहनने से सबसे पहले तो पूरी बॉडी में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • मन और मस्तिष्क मजबूत बनता है और इनकी मजबूती से कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  • कॅरियर में ग्रोथ मिलती है।
  • शरीर के अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • स्नायुतंत्र मजबूत होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • मन-मस्तिष्क में एकाग्रता बढ़ती है।

किसे पहनना चाहिए

  • स्टूडेंट्स को क्रिस्टल ब्रेसलेट जरूर पहनना चाहिए। इससे उनका मस्तिष्क उर्वर बनेगा। पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ेगी।
  • उन महिलाओं को क्रिस्टल ब्रेसलेट पहनना चाहिए जो दिमागी कार्य करती हैं।
  • गर्भवती महिलाएं हीलिंग एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही ब्रेसलेट पहनें। 
  • बिजनेस और जॉब में ग्रोथ चाहने वाले यह जरूर पहनें।
  • लव, रिलेशनशिप में मजबूती के लिए पहना जाना चाहिए।
  • दांपत्य जीवन में कोई दिक्कत चल रही है तो पहनें।
  • क्रिस्टल ब्रेसलेट फर्टिलिटी भी बढ़ाता है। नि:संतान दंपति इसे जरूर पहनें।

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