Thursday, 18 April 2019

चैत्र पूर्णिमा व्रत 19 अप्रैल को : भाग्य के दरवाजे खोल देता है यह व्रत

पं. गजेंद्र शर्मा
वैदिक ज्योतिषाचार्य, हस्तरेखा विशेषज्ञ, मंत्र विशेषज्ञ

नव संवत्सर की पहली पूर्णिमा चैत्र पूर्णिमा होती है। स्थानीय भाषाओं में इसे चैती पूनम भी कहा जाता है। हिंदू नववर्ष की पहली पूर्णिमा होने के कारण इसका महत्व काफी अधिक है। इस पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान, दान, पुण्य आदि का बड़ा महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा करने का विधान है, साथ ही इस दिन हनुमान जयंती होने के कारण इस दिन की गिनती विशेष पर्वों में की जाती है। चैत्र पूर्णिमा पर व्रत रखकर रात में चंद्रमा की पूजा की जाती है। शास्त्रों का कथन है कि चैत्र पूर्णिमा के दिन किया गया व्रत हजारों यज्ञों के समान पुण्यदायी होता है। इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा का व्रत 19 अप्रैल को किया जाएगा। चैत्र पूर्णिमा व्रत करने से जातक का भाग्य चमकता है।


चैत्र पूर्णिमा का व्रत कैसे करें
चैत्र पूर्णिमा पर स्नान, दान, हवन, व्रत और मंत्र जप किए जाते हैं। इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा की जाती है। सत्यनारायण कथा की जाती है और जरूरतमंदों, गरीबों, निश्ाक्तों को भोजन, वस्त्र आदि दान किए जाते हैं। चैत्र पूर्णिमा के दिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, जलाशय, कुएं या बावड़ी में स्नान करें। इसके बाद सूर्य मंत्र ऊं घृणि: सूर्याय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसी समय व्रत का संकल्प लेकर भगवान सत्यनारायण की पूजा करें। रात्रि में चंद्रमा की पूजा करके जल का अर्घ्य दें। पूजा के किसी जरूरतमंद को कच्चे अनाज से भरा हुआ घड़ा दान किया जाता है।

कृष्ण ने रचाया था रास
चैत्र पूर्णिमा का महत्व भगवान कृष्ण से भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार चैत्र पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में गोपियों के साथ रास उत्सव मनाया था। जो महारास के नाम से प्रसिद्ध है। इस महारास में हजारों गोपियां शामिल होती थीं और प्रत्येक गोपी के साथ भगवान श्रीकृष्ण रातभर नृत्य करते थे।

चैत्र पूर्णिमा व्रत के लाभ
- चैत्र पूर्णिमा पर सूर्योदय से पूर्व पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का नाश होता है। सारे रोग दूर होते हैं। त्वचा और नेत्र संबंधी रोग ठीक होते हैं।
- इस दिन गायों को चारा खिलाने, बंदरों को चने खिलाने और मछलियों, चीटियों को आटा खिलाने से व्यक्ति को कभी रोग, दुर्घटना और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।
- चैत्र पूर्णिमा को भाग्योदयकारक माना गया है। इस दिन गरीबों को भोजन करवाने से जातक के भाग्य की रूकावटें दूर होती हैं।
- इस दिन सायंकाल के समय पीपल के पेड़ की 108 परिक्रमा करते हुए उसके तने में कच्चा सूत लपेटें। परिक्रमा करते समय ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का मानसिक जाप करते रहें। परिक्रमा के बाद पेड़ में एक लोटा जल अर्पित करें फिर एक लोटा कच्चा दूध चढ़ाएं। इससे घर-परिवार से संकटों का नाश होता है और आर्थिक स्थिति जबर्दस्त तरीके से मजबूत होती है।

चैत्र पूर्णिमा तिथि
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 18 अप्रैल को : सायं 7.26 बजे से
पूर्णिमा तिथि पूर्ण 19 अप्रैल को : सायं 4.41 बजे तक 


इसका वीडियो देखने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें

Sunday, 14 April 2019

जब सिकंदर को हुआ आत्मबोध || by Swami Avdheshanand giri ji

नव संवत्सर की पहली एकादशी 'कामदा एकादशी' का हुआ क्षय, 15 अप्रैल को करें या 16 अप्रैल को?


पं. गजेंद्र शर्मा
वैदिक ज्योतिषाचार्य, हस्तरेखा विशेषज्ञ, मंत्र विशेषज्ञ

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह नव संवत्सर की पहली एकादशी होती है। साथ ही यह समस्त प्रकार के भौतिक सुख तो प्रदान करती ही है, व्रत करने वाले को प्रेत योनि तक से मुक्ति दिला देती है। लेकिन नए हिंदू वर्ष की इस पहली एकादशी का इस बार क्षय हो गया है। यानी एकादशी तिथि इस बार नहीं रहेगी, इसलिए व्रत करने वालों के मन में उलझन है कि वे यह एकादशी कब करें। 


हिंदू पंचांगों के अनुसार इस बार कामदा एकादशी तिथि का क्षय हो गया है। क्योंकि यह एकादशी 15 अप्रैल को सूर्योदय के बाद प्रात: 7 बजकर 08 मिनट से प्रारंभ होगी और 15 अप्रैल को ही मध्यरात्रि के बाद तड़के 4 बजकर 23 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। यानी एकादशी तिथि 15 अप्रैल को सूर्योदय के बाद से प्रारंभ होकर 16 अप्रैल को सूर्योदय से पहले ही पूर्ण हो जाएगी, इस कारण इसका क्षय हो गया है। हिंदू पंचांगों के अनुसार सूर्योदय व्यापिनी तिथि को पूरे दिन के लिए मान्य किया जाता है, लेकिन एकादशी के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है। इसलिए कामदा एकादशी का क्षय हो गया है।

कब करें व्रत?

अब सवाल यह उठता है एकादशी तिथि का क्षय भले ही हो गया हो लेकिन यह व्रत तो किया जाता है। ऐसे में व्रती किस दिन एकादशी को मानते हुए व्रत करें। भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी का व्रत मुख्यत: वैष्णवों का व्रत है लेकिन इसके महत्व को देखते हुए सभी लोग समान रूप से एकादशी करते रहे हैं। हिंदू पंचांगों में आपने स्मार्त और वैष्णव लिखा देखा होगा। स्मार्त कोई भी आस्तिक व्यक्ति हो सकता है, जो पंचदेव पूजा करता हो और वैष्णव वह हुआ जिसने वैष्णव संप्रदाय के किसी आचार्य-गुरु से मंत्र, कंठी, माला और तिलक ग्रहण किया हो। एकादशी के संदर्भ में दोनों का अपना-अपना मत है। यदि दो दिन एकादशी तिथि आती है तो स्मार्त लोग पहले दिन वाली एकादशी करते हैं, जबकि वैष्णव मत को मानने वाले अगले दिन वाली एकादशी को मान्य करते हैं। इस मामले में जबकि एकादशी का क्षय हो गया है फिर भी यही नियम मानते हुए स्मार्त लोग 15 अप्रैल को एकादशी करेंगे और वैष्णव लोग 16 अप्रैल को द्वादशीबद्ध एकादशी रखेंगे।

ऐसे हुआ एकादशी का क्षय

कामदा एकादशी प्रारंभ 15 अप्रैल को प्रात: 7.08 बजे से
कामदा एकादशी पूर्ण 15 अप्रैल को मध्यरात्रि बाद तड़के 4.23 बजे तक

इसका वीडियो देखने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें
https://youtu.be/AXZS2SZA3BE